maine apne jid ko pala hai मैंने अपने जिद्द को पाला है।

 मैंने अपने जिद्द को पाला है।

मैंने अपने जिद्द को पाला है।

मै कुछ लिखते-लिखते खुश भी नहीं लिखा और जो कुछ भी लिखा वह मेरे लिखे को विस्मृत कर दिए जाने का एक कसक रह ही जाता है। गोया एक निष्क्रिय उलाहना भी। मेरे कुछ लिखे को कुछ कवि मित्रों ने बकवास बतलाया। कुछ ने कहा 'ये सब क्यों लिखता है। कुछ मित्रों ने तो मेरे लिखे को विभत्स भी बतलाया। 


कुछ ने ये आरोप लगाया कि तुम्हे कविता लिखना नहीं आता। तुम्हारे कविताओं में न तो सरलता है न वात्सलता। न कोमलता है न सहृदयता। तुम न करुणा लिख सकते हो न प्रेम। जीवन पर तो तुम निःसंदेह कुछ लिख भी नहीं सकते हो। अब कविता-वबिता लिखना ही है तो इस चराचर धरा पर विषयों की कमी है क्या? नित्य प्रकति अपने नए कौतुक के साथ दर्शन दे रही है। बसंत नए कैनवास पर उतरा हुआ है। लिखने के लिए पेड़ है, जंगल है, जमीन है, नदी झरने हैं, इस पर लिखते हुए तुम्हें उबासी आती है क्या? 


अलबता मजे की बात ये है कि 144 साल बाद महाकुम्भ महीनों से लगा है, और दुनिया भर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस आस्था के कुम्भ में लाखों नहीं करोड़ों लोग डुबकी लगा चुके है और आज भी लगा रहे है। इस महाकुम्भ से कितने ही वारे न्यारे हो गये। कितनों का गाथा लिखा जा चुका, पर तुम आभागे एक चार पंक्ति की कविता नहीं टांक सके। धिक्कार है तुम्हारे कवि होने पर। और लिखा भी तो ये क्या लिख दिया।


"सम्भवतः... ईश्वर मर भी गये होंगे।" इतना बड़ा ईश्वर पर आरोप, क्यों? जो चराचर विश्व का मालिक है। छिः!!! अरे क्या जानते हो तुम ईश्वर के बारे में। उनकी महानता इतना बड़ा आरोप।"  इसी तरह न जाने कितने अक्षेपों का सामना करना पड़ा। 


कहते हैं शांत जल मे कंकड फेकने से उसके तरंगो में असर पड़ने लगता। मै तो भला इंसान हूँ, और भले इंसानो पर एक-एक शब्दों का असर दिखने लगता है। जैसे आनंद, सुख, आभार, घृणा, गुस्सा, साहस, उत्साह आदि आदि। प्रत्येक शब्द अपने भिन्न पहनावे के साथ उपस्थित होता है। लेकिन सवाल है मेरा शब्द, पंक्ति-पंक्ति आखिर किस आवरण में अवतरित होगा। 


इसी उधेड़बन में मै लिखना भूल जाता हूँ। न लिखने का कसक मुझे बार बार उकसाता है। बार-बार प्रताड़ित करता है। बार-बार धिकारता है। यहाँ तक कि मुझे आलसी, निकम्मा, डरपोक और न जाने कैसे-कैसे उलाहने देता है। अंदर ही अंदर मुझे मथता रहता है। अब आप ही बताइए लिखूँ नहीं तो क्या करूँ। लिखता हूँ तब दिल दिमाग को चैन मिल जाता है। जैसे भूखे को पेट भर खुराक मिल गया हो।


अब कुम्भ की बात निकली है तो क्या उसका स्तुतिगान करूँ। जिस कुम्भ के चलते कितने अच्छे खासे इंसान अपने जिंदगी में मस्त इंसान भिड़ में कुचल दिए गये। क्या उसे न लिखूँ। कितनी चीखें इस आस्था के शोर में दब गये। बाद में ढूंढने पर उनका मृत लाश भी साबूत नहीं मिला। गंगा को तर्पण करने के लिए उसका राख तक नहीं मिला। ऐसे में मै उनका हिमायति न बनूँ। उसका शोक- गीत न लिखूँ।


मैने भी अपने जिद्द को पाला है। उसे अपने पसीने से सिंचा है। उसे लहूलुहान क्यों होने दूँ। मै लिखूँगा, और अवश्य लिखूँगा।

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