साहित्य ~ संस्मरण
आज रविवार है। सप्ताहिक परिचर्चा के तहत आज से हम शुरु करते हैँ एक सप्ताहिकी जिसमें साहित्य की विधाएं आलेख, संस्मरण, कथा कहनी पढ़ने को मिलेंगे। यह आलेख (संस्मरण) हमारे गाँव मे हुई एक सच्ची घटना का दस्तावेज है। आइए आज हम पढ़ते हैँ यह संस्मरण
भय मिश्रित वेदना की अनुगूंज पुकार...!
रात्रि के ग्यारह बज गए और मैं अबतक सो नहीं पाया था। नींद से जैसे शायद बैर हो गया हो। बहुत मान मनौअत करते हुए सोने का भरसक प्रयत्न कर रहा था, लेकिन सो नहीं पा रहा था। मैं थक-हारकर उठ बैठा। खुद पर झल्लाया, गुस्साया, लेकिन क्या करता, स्वयं को सजा तो नहीं दे सकता न। खैर अभी इसी ऊहापोह में था। फिर उठकर कमरे में टहलने लगा। टहलते हुए किचन में पहुँचा और अपने लिए एक कप चाय बनाया।
वापस कमरे में आया तो दीवार पर मेरा सबसे हसीन सपना टँगा हुआ था। मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था। मैं भी थोड़ा मुस्कुराया। कुछ देर तक सुखद किन्तु अदृश्य संवाद चलता रहा। फिर वह दीवार से उतरकर मेरे हृदय में आकर धमनियों में दौड़ने लगा। मेरे आँखों में बसकर जलने लगा। पुनः मेरी दृष्टि दीवार पर गई। एक सुंदर सा पेंटिंग मुझे निरन्तर देखे जा रहा था।
वह! वह पेंटिंग जो कि मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे आनंद के दिनों में मुझे गिफ्ट किया था। कमरे में जल रहे रंगीन बल्वों के प्रकाश में वह पेंटिंग और भी सुंदर लगने लगा था। उसमें एक अप्सरा जैसी लड़की, एक कृषकाय विकृत चेहरे वाले लड़के को एक गुलदस्ता थमा रही थी। एक बूढ़ी औरत, एक जवान प्रेमी के धूल से भरे चेहरे को साफ कर बड़े ममत्व के साथ चुम रही थी। एक वृद्ध, अपने बचपन को अपने कंधे पर बिठाकर खिलखिला रहा था। मेरे टेबल पर दिनकर का महाकाव्य 'उवर्शी' के पन्ने सीलिंग फैन के चलने से फड़फड़ा रहा था। किताबों के कभर पर कुछ फूल रखे हुए थे। एक अत्यंत की खुशबूदार खुश्बू से पूरा कमरा महक रहा था मानो यह एक मीठा सपना हो।
यह वही कहानी है, जो एक विषम्य से भर देने वाला लेख लिख रहा है और गाँव गहन सन्नाटे के चादर ओढ़े सो रहा है। शांत, मौन रात्रि के सघन अंधकार में निमग्न। न कोई प्रतिरोध न कोई अवरोध। तभी मुहल्ले से रोने की आवाज आती है और रीढ़ में धसक जाती है। शरीर में एक सिहरन होता है। शरीर का एक-एक अनु उस रुदन की आवाज से भर जाता है, और आत्मा में अपार पीड़ा के गीत गूँजने लगते हैं। उस पीड़ा में मेरा सबसे हसीन सपना मौन हो गया था। उदासी और निर्जीव सा, सन्नाते का आवरण ओढ़ लिया था। मुहल्ले में गहन सन्नाटे को चीरता रुदन की आवाज कितनी भयानक लग रही थी। ऐसा लगता था जैसे एक साथ कई सुहागिनें, औरतें, बच्चें एक साथ रो रही हों लेकिन उस रुदन में सांतावना का एक भी शब्द नहीं था।
मैं मुहल्ले में निकला तो गहन अंधकार में बहुत सारे मानव आकृतियों को डोलते हुए पाया। नजदीक पहुँचा तो एक शब्द बहुत ही बेरहमी से चीख रहा था--- *'हत्या...'* मेरे प्रिय गायक, जो जीवन भर गीत, संगीत, कीर्तन, भजन में रमे रहे, अपने जीवन के लगभग साठ वर्ष कीर्तन भजन को समर्पित कर दिए, अचानक इस काली रात में स्वयं को हत्या के दानव को कैसे समर्पित कर दिया। जीवन भर अपने सुरों को सजाकर प्रखर गायन से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले, कई सम्मान पदक जीत कर अपने नाम कर लेने वाले आज अपनी जिंदगी की दांव हार गए थे।
आत्मा हाहाकार कर उठा। क्या गीत संगीत को भी किसी से दुश्मनी हो सकती है। हत्या जैसे जघन्य अपराध भी क्या कण्ठ के सुरों को अपने खूनी पंजे में दबोच सकता है। चन्द्रमा अपनी मलिन रोशनी के साथ रो रही थी। मन्दिर की पवित्र घण्टियों की आवाज मौन पड़ी थी। सिसक रही ही।
मृत्यु अपना उत्सव मना रहा था। समय भी एक सबसे बहसी कहानी को लिख रहा था। बहुत सारे लोग जो उनके शुभचिंतक थे, अपने थे, कभी उस क्षत-विक्षत खून से सने मृत शरीर को देख रहे थे। कभी आपस में ही कानाफूसी कर रहे थे। सबके आवाज में एक आह था, कम्पन था, रुदन था और सबसे मिश्रित एक प्रश्न कौतुक कर रहा था-'यह कैसे हुआ', 'किसने किया ऐसा घिनौना काम', 'क्या किसी ने देखा नहीं', 'इन जैसे सीधे-साधे आदमी को कोई भला कैसे मार सकता है, और मारा भी तो इस बहशीपन के साथ कि पूरा कुल्हाड़ी, फल तक छाती में धसक गया है।'
मैं उनके पास गया। आँखों के कोरों से अविरल आँसू निकल रहे थे। उनके मुखमण्डल पर पवित्रता अब भी थिरक रही थी। शांत चेहरे पर एक प्यारा सा आमन्त्रण था, जैसे गीत की कोई कड़ियाँ गुनगुना रहे हों किसी भी हादसे पर परिवार रोता है, अपने रिश्तेदार, शोक के सागर में डूब जाते हैं और गांव के लोग चर्चा में व्यस्त रहते हैं। जीवित लोग मर चुके शरीर का अपने तरीके से समीक्षा करता है, उसके अबतक के जिए गए जीवन का हिसाब किताब लगाता है। उसके नैतिक गुणों की चर्चा करते हुए, गहन निःस्वास के साथ आहें भरता है।
रात्रि के तीसरे प्रहर में पुलिस आई। पूछताछ शुरू हुआ। बहुत सारे लोंगो से गहन पूछताछ किया गया। मृत पड़े शरीर का तस्वीर लिया गया। पुलिस अगले कार्रवाई के लिए कुछ गाँववालों को लेकर शव को पोस्टमार्टम के लिए शहर भेज दिया। इन सारी प्रक्रियाओं के बीच एक कायर चुप्पी की जड़ता हमेशा हावी रही। अपने छद्म रूप को एक अदृश्य आवरण से छिपाती रही। हत्यारा कौन था किसी को मालूम नहीं? 'किसने किया ये सब?' 'इस हत्या की साजिश किस उजाले में रचा गया होगा?' किसी को कुछ भी पता नहीं। समय के श्याम पट पर यह प्रश्न सुर्ख रंगों में उभरता पूरे व्यवस्था के लिए, स्वस्थ और शांति पूर्ण जीवन के लिए एक चुनौती था।
अंत में सुवह होती है। चौराहे, पर, हर गली के नुक्कड़ पर, एक संगीत के पुरोधा की खौफनाक हत्या की चर्चाएँ हैं। एक भयभीत मातम है। लेकिन प्रश्न का कोई उत्तर किसी के पास नहीं कि ये अपराध किसने किया है? हकीकत के साथ कोई आवाज नहीं बल्कि उसके विरुद्ध प्रतिकार है, प्रतिशोध है, बहस है। उतर हर चौराहें पर जाकर समीक्षा कर रहा है। उस युक्ति को ढूंढ निकालने के लिए, जिससे हत्यारे तक पहुंचा जा सके। उस दिन की सुवह एक हत्यारी उज्ज्वलता और श्मशान की चुप्पी में बदल गई थी, जिसमें एक तड़प था, एक रहस्यमय डर था, एक भय मिश्रित वेदना की अनुगूंज पुकार थी।
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